मार्तण्ड — सूर्य का जन्म
यह उस समय की बात है, जब आकाश भी समुद्र की तरह अनंत और गहरा हुआ करता था। तब एक ही परिवार आपस में लड़ रहा था। वैसे परिवारों में झगड़े होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अनोखी बात यह थी कि यह लड़ाई हम जैसे आम इंसानों के बीच नहीं थी।

देवता और असुर दोनों का खून एक ही था। उनके पिता कश्यप एक धैर्यवान ऋषि थे, जिनकी बहुत सी दिव्य संतानें हुईं। उनकी पत्नी अदिति ने देवताओं को जन्म दिया। कश्यप ऋषि की दो और पत्नियाँ थीं — दिति और दनु। दिति के बच्चों को 'दैत्य' कहा गया और दनु के बच्चों को 'दानव'। वैसे हम इन दोनों को 'असुर' के नाम से ही जानते हैं। माएँ भले ही अलग थीं, लेकिन इन सबका खून एक ही था। इन सबकी एक ही इच्छा थी — तीनों लोकों पर अधिकार पाना। नतीजा यह हुआ कि एक ही परिवार के ये दोनों पक्ष आपस में लड़ने लगे कि तीनों लोकों पर राज कौन करेगा।
और लगातार असुर जीत रहे थे।
एक-एक करके पृथ्वी, पाताल और खुद देवताओं का घर यानी स्वर्ग — तीनों जगहों पर अंधेरा छा गया। यह अंधेरा वैसा ही था जैसे किसी जलते हुए दीये पर हाथ रख देने से हवा रुक जाती है और दीया बुझ जाता है। देवता अपने ही स्वर्ग से बेघर होकर यहाँ-वहाँ भटकने लगे। वे जहाँ भी जाते, वहाँ का उजाला गायब होने लगता और पूरी दुनिया अंधेरे में डूबने लगती।
देवताओं की माँ अदिति अपने बच्चों के चेहरों पर यह दुख देख नहीं पा रही थीं। एक माँ दुनिया के सारे दुख सह सकती है, लेकिन यह कभी नहीं बर्दाश्त कर सकती कि जिस संसार को उसने अपने बच्चों के लिए सजाया, वही उनसे छीन लिया जाए और वह बेबस खड़ी देखती रहे।
इसलिए उन्होंने खुद सूर्य देव की शरण ली। उन्होंने व्रत रखे, प्रार्थनाएँ कीं और अपने शरीर को इस कठिन तप में झोंक दिया — शायद ऐसा त्याग केवल एक माँ ही कर सकती है। आख़िरकार सूर्य देव उनके सामने प्रकट हुए। वे पिघले हुए ताँबे की तरह चमक रहे थे। उन्होंने अदिति से पूछा कि वे क्या चाहती थीं।
अदिति ने न तो कोई सेना माँगी, न हथियार और न ही शक्ति का कोई वरदान। उन्होंने बस सूर्य देव से अपना पुत्र बनकर जन्म लेने की विनती की। वे चाहती थीं कि सूर्य देव उनके पुत्र बनकर आएँ, असुरों का खात्मा करें और देवताओं को उनका खोया हुआ राजपाट वापस दिलाएँ।
सूर्य देव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। लेकिन वे अपने पूरे तेज के साथ अदिति के गर्भ में नहीं आ सकते थे, क्योंकि उनका ताप अदिति को अंदर से जला देता। इसलिए उन्होंने अपनी हजारों किरणों में से सिर्फ एक किरण अदिति के गर्भ में भेजी, जिसे अदिति ने धारण कर लिया।
महीने गुजरते गए और अदिति अपने व्रत और उपवास करती रहीं। वे लंबे समय तक मौन रहतीं और धीरे-धीरे अपना भोजन भी कम करती गईं। उनके शरीर का तेज कम होने के बजाय और बढ़ता जा रहा था। ऐसा लगता था, जैसे दीपक में तेल कम होता जा रहा हो, फिर भी उसकी लौ और तेज जल रही हो। कश्यप यह सब देख रहे थे। अदिति की हालत देखकर उनके मन में डर भी लगातार बढ़ता जा रहा था। आखिर एक दिन वे खुद को रोक नहीं पाए। क्रोध में, या शायद डर के कारण, उन्होंने कहा, "तुमने जिस बालक को अपने गर्भ में धारण किया है, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे इस व्रत और उपवास से उसकी जान चली जाए। यह बालक तो जैसे जन्म से पहले ही मृत हो गया है।"
अदिति ने बिना किसी डर के शांत होकर उनकी ओर देखा और कहा, "यह बालक नहीं मरेगा। यही अधर्म का अंत करेगा।" और उसी क्षण, जैसे उस भविष्यवाणी का जवाब देने के लिए, अदिति ने उस बालक को जन्म दिया।
कश्यप ने जन्म से पहले ही उस बालक को "मृत समान" कह दिया था। इसी कारण उसका नाम मार्तण्ड पड़ा। माना जाता है कि यह नाम "मृत" और "अण्ड" से बना है। मृत यानी मरा हुआ और अण्ड यानी गर्भ का अंड। यानी वह बालक, जिसे दुनिया में आने से पहले ही मृत कह दिया गया था।
दिलचस्प बात यह है कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने शायद उस सच्चाई को बहुत पहले ही अपने तरीके से समझ लिया था, जिसे खोजने में वैज्ञानिकों और खगोलविदों को सालों लग गए। एक तारे का जन्म भी एक तरह से मृत्यु के बाद ही होता है। अंतरिक्ष में फैली ठंडी धूल और गैसें बहुत लंबे समय तक इधर-उधर भटकती रहती हैं। फिर गुरुत्वाकर्षण की वजह से वे धीरे-धीरे एक जगह इकट्ठा होने लगती हैं। जैसे-जैसे यह धूल आपस में सिमटती जाती है, वैसे-वैसे इसके अंदर की गर्मी बढ़ने लगती है और आखिर में उसके भीतर प्रकाश पैदा होता है यानी एक नया तारा चमक उठता है। हमारा सूर्य भी इसी ब्रह्मांडीय धूल से जन्मा एक तारा है।
और फिर मार्तण्ड ने अपनी आँखें खोलीं। उनके जन्म के साथ ही ऐसा लगा, जैसे अंधकार के लिए अब कहीं कोई जगह नहीं बची।
असुर इतने लंबे समय से अंधकार में रह रहे थे कि उन्होंने यह उम्मीद ही छोड़ दी थी कि प्रकाश कभी वापस आएगा। लेकिन जैसे ही मार्तण्ड युद्धभूमि के ऊपर सूर्य की तरह चमके, उनकी रोशनी हर कोने और हर उस अंधेरी जगह तक पहुँच गई, जिसे असुरों ने अपना घर बना लिया था। अब उनसे कुछ भी छिप नहीं सकता था। न वह महत्वाकांक्षा, जो धर्म का रूप ले चुकी थी, और न वह पुरानी क्रूरता, जो व्यवस्था का चेहरा बनकर खड़ी थी। जहाँ भी मार्तण्ड का प्रकाश पहुँचा, हर चीज़ अपने असली रूप में दिखाई देने लगी। और कई बार सच को सामने लाने के लिए इतना ही काफी होता है।
इस लड़ाई में लंबे समय तक भटकते-भटकते देवता भी अपनी शक्ति और अपना भरोसा भूल चुके थे। लेकिन सूर्यपुत्र के आने के बाद उन्हें फिर याद आया कि वे कौन हैं और किसके लिए लड़ रहे हैं। वे फिर से सीधे खड़े हुए और युद्ध के लिए आगे बढ़े। इंद्र ने हमेशा की तरह उनको रास्ता दिखाया। वे जोश और ऊर्जा से भरे हुए थे और किसी भी काम की शुरुआत करने में माहिर थे, भले ही उसके बाद उसे कैसे आगे बढ़ाना है, इसमें वे हमेशा उतने अच्छे नहीं रहे। लेकिन इस बार सब कुछ बदल चुका था। जो युद्ध लंबे समय से एक ही दिशा में जा रहा था, उसका रुख एक ही सुबह में बदल गया। सूर्यपुत्र की एक नज़र ने स्वर्ग को गंदा करने वाली हर चीज़ को जला दिया और तीनों लोक फिर से उन्हीं के पास लौट आए, जिनका उन पर अधिकार था।
यही हैं सूर्य — और यही उनका कुंडली में अर्थ
सूर्य एक योद्धा हैं। वे कोमल ग्रह नहीं हैं। वे झूठ को जलाकर राख कर देते हैं और जो कुछ भी बिगड़ चुका हो, उसे फिर से ठीक करते हैं। इसीलिए पुराने ग्रंथ उन्हें एक सख्त और क्रूर ग्रह कहते हैं। उनकी आग जलाती भी है और (बुरी चीज़ों को) अलग भी करती है। जो उनके बहुत पास जाए, वह झुलस सकता है। लेकिन उनकी इस सख्ती में कोई कड़वाहट या दुश्मनी नहीं होती। यह सख्ती बिल्कुल साफ और पवित्र है। कुंडली में उनका असर इंसान के भीतर और बाहर की झूठी परतों को जला देता है, और उसे अपने जीवन के सबसे सच्चे रास्ते पर लौटने के लिए कहता है।
सूर्य राजा हैं। उनका खानदान खुद ब्रह्मा जी से जुड़ा है, जिन्होंने इस पूरी दुनिया को बनाया है। उन्हीं के बाद से दुनिया में राजाओं, राज चलाने वालों, बड़े अफ़सरों और बड़ी-बड़ी चीज़ें बनाने वालों की एक लंबी परंपरा शुरू हुई। इसीलिए जब किसी की कुंडली में सूर्य मजबूत होते हैं, तो वह इंसान दूसरों का मार्गदर्शन करने, ज़िम्मेदारी सँभालने या ऊँचे पदों पर काम करने की तरफ अपने आप खिंचने लगता है। यह बिल्कुल ऐसा है, मानो उसके भीतर आज भी अपने उस पुराने खानदान की कोई याद छिपी हो, जिसने कभी तीनों लोकों को फिर से सही रास्ते पर लाकर खड़ा किया था।
सूर्य हमारे शरीर की जीने की चाहत और हमारी असली ताकत भी हैं। पुराने ग्रंथों में कहा गया है कि वे बीमारियों से लड़ने की शक्ति देते हैं और हर तरह के अंधेरे को दूर करते हैं। इसीलिए सूर्य की लड़ाई सिर्फ किसी युद्ध के मैदान में नहीं होती। यह लड़ाई हर रोज़ हमारे शरीर के अंदर भी चलती है — कमजोरी, थकान और बीमारी के खिलाफ।
लेकिन सूर्य का एक और रूप है, जिस पर अक्सर कम बात होती है। वे बिना किसी शर्त के देते हैं।
हर सुबह सूर्य बिना किसी के माँगे और बिना किसी धन्यवाद की उम्मीद किए सबको रोशनी देते हैं। उनकी धूप किसी राजा के बड़े खेत पर भी उतनी ही पड़ती है, जितनी उस गरीब महिला की छोटी सी झोपड़ी पर, जिसके पास कुछ भी नहीं है। सूर्य देव यह सोचकर भेदभाव नहीं करते कि उनकी रोशनी किसे मिलनी चाहिए और किसे नहीं। वे कोई हिसाब-किताब नहीं रखते। वे बस अपना उजाला सब पर एक जैसा लुटाते हैं। यह कोई ऐसा फैसला नहीं है, जो वे हर सुबह सोच-समझकर लेते हैं। वे ऐसे ही हैं। यही उनका असली स्वभाव है।
और इस तरह सबको रोशनी देते-देते वे खुद भी थोड़ा-थोड़ा जलते रहते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे उन्होंने माता अदिति के लिए अपनी हज़ारों किरणों में से सिर्फ एक किरण दे दी थी, ताकि एक ऐसा बच्चा जन्म ले सके जो दुनिया को फिर से सही रास्ते पर ला सके।
यही हैं मार्तण्ड। यानी हमारे सूर्य देव। वे आत्मा भी हैं, राजा भी हैं और ऐसे योद्धा भी हैं, जो झूठ को जलाकर सच्चाई का रास्ता साफ करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपना थोड़ा सा हिस्सा भी दे देते हैं, ताकि इस दुनिया में भलाई और संतुलन बने रह सकें।