संज्ञा और छाया — पत्नी और उसकी परछाईं

CosmicSync9 min read
Englishहिंदी
अपनी पत्नी संज्ञा और उनकी छाया के बीच खड़े सूर्य
संज्ञा, छाया और सूर्य

बहुत समय पहले की बात है। सूर्य देव का विवाह संज्ञा से हुआ था, जो विश्वकर्मा की पुत्री थीं। विश्वकर्मा वही महान शिल्पकार थे, जिन्होंने देवताओं के शानदार शहर बनाए और उन दुनियाओं को भी आकार दिया, जहाँ वे शहर बसे थे। संज्ञा तेजस्वी थीं और अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं। काफ़ी समय तक उनके सुखी जीवन के लिए इतना ही काफ़ी था। उनकी तीन संतानें हुईं। पहले थे वैवस्वत मनु, जो आगे चलकर इंसानों के सबसे पहले पूर्वज और नियम बनाने वाले बने। दूसरे थे यम, जो मौत के उस दरवाज़े पर खड़े रहते हैं जहाँ से हर जीव को एक न एक दिन गुज़रना पड़ता है। और तीसरी थीं यमी, जो आगे चलकर यमुना नदी बन गईं और समय के साथ यह बात भूल गईं कि वे पहले कोई और थीं, ठीक वैसे ही जैसे नदियाँ अक्सर अपना पुराना रूप भूल जाती हैं। कई सालों तक उनका जीवन ऐसे ही चलता रहा। बच्चे बड़े होते गए और घर में सुख-शांति बनी रही।

लेकिन धीरे-धीरे दोनों के बीच की दूरियाँ बढ़ने लगीं, और इसमें सच कहें तो किसी एक की भी ग़लती नहीं थी। आखिर सूर्यदेव का तो अपना एक तेज था। वे दूर रहकर पूरी दुनिया को जीवन और रोशनी देते थे, लेकिन पास से उसी तेज को सहना बहुत कठिन था। संज्ञा के लिए सूर्यदेव के पास रहना बहुत कठिन था। वे अपने पति सूर्यदेव से प्रेम तो बहुत करती थीं, लेकिन उनके तेज प्रकाश और गर्मी के कारण रोज़ मजबूरी में अपना चेहरा छिपा लेती थीं। इसी तरह वे अपने पति के पास रहते हुए यह दुख चुपचाप सहती रहीं।

वे न तो सूर्यदेव को छोड़ पा रही थीं और न ही इस तरह आगे जी पा रही थीं। इसलिए उन्होंने एक अजीब और कठिन रास्ता चुना। उन्होंने अपनी ही परछाईं से ठीक अपने जैसी एक स्त्री बनाई और उसका नाम 'छाया' रखा — यानी एक ऐसी परछाईं जो अपने पैरों पर चलने लगी हो। संज्ञा ने छाया से अपनी जगह लेने, बच्चों का ध्यान रखने और इस राज़ को दोनों के बीच ही रखने को कहा। इसके बाद संज्ञा खुद घोड़ी का रूप धारण करके चुपचाप उत्तर दिशा की ठंडी जगहों की ओर चली गईं, ताकि वे सूर्यदेव की गर्मी से दूर रहकर तपस्या कर सकें।

सूर्यदेव इस बदलाव को समझ नहीं पाए। उन्होंने छाया को देखा और उन्हें अपनी पत्नी ही समझा। वे हमेशा की तरह उनके साथ रहने लगे। समय के साथ सूर्यदेव और छाया की भी संतानें हुईं। पहले थे शनैश्चर, जिन्हें हम शनि कहते हैं, जो आगे चलकर हर इंसान के कर्मों का हिसाब रखकर उसे सही फल देने वाले बने। उनके दूसरे पुत्र सावर्णि मनु थे और दो बेटियाँ थीं, ताप्ती और विष्टि।

लेकिन कोई छाया चाहे किसी का रूप कितनी ही सच्चाई से क्यों न धारण कर ले, कभी किसी माँ की तरह उसके बच्चों को प्यार नहीं दे सकती। छाया का प्रेम केवल अपने बच्चों के लिए था। संज्ञा के बच्चों के प्रति उनका व्यवहार ठंडा होता गया। बच्चों को उस ठंडेपन का एहसास तब से होने लगा था, जब वे अपनी पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना भी नहीं जानते थे।

आखिरकार यम के लिए यह सब सहना मुश्किल हो गया। इस भेदभाव ने बालक यम को भीतर तक दुखी कर दिया था। एक दिन गुस्से में आकर उन्होंने छाया पर अपना पैर उठा दिया। लेकिन बिल्कुल आखिरी मौके पर खुद को रोक लिया। उन्होंने खुद को संभाल लिया और पैर पीछे खींच लिया। शायद उसी पल उन्होंने अपने नाम का असली अर्थ समझा। 'यम' का अर्थ है संयम, यानी खुद पर काबू पाना।

लेकिन छाया का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने गुस्से में यम को शाप दे दिया।

उन्होंने कहा, "तुम्हारा पैर सूख जाएगा, सड़ने लगेगा और उसमें कीड़े पड़ जाएँगे।"

आखिर यम अभी एक बालक ही थे। वे रोते हुए अपने पिता के पास पहुँचे। एक बार दिया गया शाप वापस नहीं लिया जा सकता था। खुद सूर्यदेव भी उसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते थे। लेकिन वे उसका असर कम कर सकते थे और उन्होंने ऐसा ही किया। उन्होंने शाप का असर इतना कम कर दिया कि यम के पैर से केवल थोड़ा-सा मांस ही गलकर गिरा, उनका पूरा पैर नष्ट नहीं हुआ। इस तरह उनका पुत्र शाप के सबसे भयानक परिणाम से बच गया।

लेकिन इस घटना ने सूर्यदेव को अंदर से परेशान कर दिया। कोई सच्ची माँ अपने ही बच्चे को ऐसा शाप नहीं देती। फिर छाया ने ऐसा क्यों किया? यह सवाल सूर्यदेव के मन में बार-बार उठने लगा। उन्हें लगने लगा कि जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसके पीछे कोई और सच्चाई है।

सूर्यदेव ने सीधे छाया से पूछा कि आखिर बात क्या है, लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया। इस पर सूर्यदेव का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने छाया के बाल पकड़ लिए और वहीं खड़े-खड़े उन्हें शाप देने के लिए हाथ उठा दिया। यह देखते ही छाया घबरा गईं और बोलीं, "मैं संज्ञा नहीं हूँ। मैं केवल उनकी छाया हूँ। आपकी गर्मी इतनी तेज थी कि आपकी पत्नी उसे सह नहीं सकीं। इसलिए उन्होंने मुझे अपने स्थान पर बनाया था।"

यह सुनते ही सूर्यदेव गुस्से में विश्वकर्मा के पास गए, जो पूरा सच जानते थे। विश्वकर्मा सूर्यदेव से नहीं डरे। उन्होंने वह बात कह दी, जिसे शायद कोई और कहने की हिम्मत नहीं करता। उन्होंने कहा, "आपका तेज बहुत ज्यादा है। आपकी गर्मी और चमक इतनी तेज हैं कि कोई भी उन्हें सह नहीं सकता। आपकी अपनी पत्नी भी उन्हें नहीं सह सकीं।"

तब उस शिल्पकार ने वही किया जो केवल देवताओं के अस्त्र-शस्त्र बनाने वाला ही कर सकता था। उन्होंने सूर्यदेव को अपने उस बड़े चक्र पर रखा, जिस पर वे देवताओं के अस्त्र और उपकरण बनाया करते थे। फिर उन्होंने सूर्यदेव की अग्नि का आठवाँ हिस्सा घिसकर कम कर दिया। इसके बाद सूर्यदेव का तेज इतना रह गया कि कोई उन्हें बिना घबराए देख सके। पुराने ग्रंथों में कहा गया है कि उस चक्र से उतरने के बाद सूर्यदेव का तेज शांत हो गया और वे पहले से भी अधिक सुंदर दिखने लगे। उनका प्रकाश अब संतुलित और पूर्ण था। उसमें पहले जैसी बेकाबू आग नहीं थी। सूर्यदेव के तेज से जो टुकड़े घिसकर गिरे थे, उन्हीं से आगे चलकर सुदर्शन चक्र बनाया गया।

उत्तर के हिमक्षेत्रों में घोड़े के रूप में सूर्य, घोड़ी के रूप में संज्ञा की ओर बढ़ते हुए

अब सूर्यदेव का तेज शांत हो चुका था। वे अपनी पत्नी संज्ञा को खोजने निकल पड़े। उन्होंने घोड़े का रूप लिया और संज्ञा को दुनिया के उत्तरी छोर पर चरते हुए खोज निकाला, जहाँ वे घोड़ी के रूप में रह रही थीं। सूर्यदेव को अपनी ओर आते देखकर संज्ञा फिर भागने लगीं। उन्हें अभी भी वही पुरानी झुलसा देने वाली गर्मी याद थी। लेकिन जब सूर्यदेव पास आए, तो संज्ञा ने महसूस किया कि अब उनका ताप इतना तेज नहीं था कि उन्हें जला दे। उसे सहा जा सकता था। इसलिए संज्ञा ने अपनी चाल धीमी कर दी और सूर्य को अपने पास आने दिया।

दोनों के इस मिलन से 'अश्विनी कुमारों' का जन्म हुआ। वे जुड़वाँ देवता थे, जिन्हें जन्म से ही उपचार की विद्या प्राप्त थी। वे स्वयं देवताओं के वैद्य बने। वे बीमार लोगों की देखभाल करते थे और ऐसी हालत में पहुँच चुके लोगों को भी बचाने की क्षमता रखते थे, जिन्हें मृत्यु के बहुत करीब माना जाता था।

यह सूर्यदेव के रहस्यमय जीवन की कथा का दूसरा हिस्सा है।

यह कथा कुंडली में क्या छोड़ जाती है

सूर्यदेव के तेज से बना सुदर्शन चक्र आगे चलकर समय के पहिए (कालचक्र) के रूप में जाना गया। सूर्य ही इस दुनिया में समय की गति को संभालते हैं। उनका उगना और ढलना दिन बनाता है, और आकाश में उनकी साल भर की यात्रा वर्ष का हिसाब तय करती है। बाकी सारा समय उन्हीं की चाल से नापा जाता है। वे न कभी जल्दी आते हैं, न देर से। उनका यह नियम अपने आप में एक अनुशासन है। सूर्यदेव का यही अनुशासन मजबूत सूर्य वाले व्यक्ति के जीवन में भी दिखाई देता है।

सूर्यदेव एक पिता भी हैं और उनकी संतानें इंसान के जन्म से लेकर अंतिम हिसाब-किताब तक की शक्तियों को दर्शाती हैं। मनु वे नियम-कानून देते हैं, जिनके हिसाब से इंसान ज़िंदगी जीता है। यम जीवन के अंत में इंसान का इंतजार करते हैं। शनि जीवन के बीच में इंसान के अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब रखते हैं। इस तरह सूर्य के बच्चों के ज़रिए एक आत्मा की शुरुआत से लेकर अंत तक की पूरी यात्रा दिखाई देती है।

लेकिन इस कहानी की सबसे गहरी सीख यह है कि हर इंसान के भीतर के तेज को कम करने के लिए कोई विश्वकर्मा नहीं आता।

सूर्य अहंकार और हमारे भीतर के "मैं" के भाव को दिखाते हैं। सही रूप में यह एक शांत और मजबूत आत्मविश्वास है, जैसे आत्मा अपने सही ठिकाने पर बैठी हो। लेकिन जब सूर्य कमजोर हों, तो यही "मैं" गर्व और दूसरों पर अधिकार जमाने की इच्छा में बदल सकता है। दोनों स्थितियों में अग्नि वही है। एक अच्छे नेता और एक ज़ालिम राजा में फर्क केवल इतना होता है कि वह अपने भीतर के तेज को देख पाता है या नहीं। इस कहानी में भी सूर्य को बदलने से पहले उन्हें उनका सच दिखाया गया था। जो इंसान अपनी कमी या अति को पहचान लेता है, वह सच्चा नेता बनता है; जो कभी नहीं पहचानता, वह ज़ालिम बनता है और अंत में अकेला रह जाता है।

इस तेज और अहंकार का सबसे बुरा असर शादीशुदा जिंदगी पर पड़ता है। ज्योतिष में सूर्य अक्सर 7वें भाव, यानी साझेदारी के भाव में सहज नहीं होते, क्योंकि वे अपना अहंकार उस स्थान पर ले आते हैं, जहाँ प्यार, नरमी और बराबरी की ज़रूरत होती है। यही वजह है कि सूर्य तुला राशि में सबसे कमजोर माने जाते हैं, क्योंकि तुला राशि दो लोगों के बीच संतुलन की राशि है। सूर्य राजा हैं और राजा को बराबरी के रिश्ते में सहज होना कठिन हो सकता है। इसी तरह, जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास आता है, तो वह 'अस्त' हो जाता है — यानी उसकी अपनी चमक सूर्य के तीखे प्रकाश में छिप जाती है।

यह कहानी ज्योतिष से जुड़ी एक छोटी और अनोखी बात भी बताती है। गुस्से में सूर्यदेव ने छाया के बाल पकड़े थे। इसीलिए कुछ व्यावहारिक ज्योतिषीय परंपराओं में कमजोर या पीड़ित सूर्य को बालों के झड़ने और माथे के बाल पीछे हटने से जोड़कर देखा जाता है। सूर्य की गर्मी वहाँ तक भी अपना असर डालती है।

यह सूर्य की एक और कहानी है। इस बार किसी योद्धा की नहीं, बल्कि एक पति की। वह अग्नि, जो युद्ध जिता सकती थी और पूरी दुनिया को रोशनी दे सकती थी, उस स्त्री के लिए बहुत तीखी थी, जो उनसे सच्चा प्रेम करती थी। आखिरकार सूर्यदेव को अपनी आग का एक हिस्सा छोड़ना ही पड़ा। पूरी दुनिया को रोशनी देने वाले को भी अपना तेज कम करना पड़ा, ताकि प्यार उनके साथ रह सके।

Read next

All posts →
एक लक्ष्य, एक युवक और गुरु की बेटीउसने हज़ार वर्ष सेवा की और उन पवित्र मंत्रों के लिए तीन बार मृत्यु सही — और शुक्र आज तक वही लिए चलते हैं।Get CosmicSync